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टोपी-दाढ़ी वालों को देख गैर-मुस्लिम भी अदब से छोड़ देते थे रास्ता-मुं.सरफराज सागर
- दैनिक लोक भारती
- 19 Jul, 2026
बदलते दौर में मुसलमानों की गिरती साख की वजह उनकी सियासत, लालच, झूठी शोहरत और अहंकार है
कुशीनगर। एक दौर वह था जब इस्लाम को दुनिया का सबसे बेहतरीन और पाक दीन-ए-इस्लाम कहा जाता था। उस समय मुसलमानों की पहचान सिर्फ टोपी, दाढ़ी या लिबास से नही बल्कि उनके किरदार, सच्चाई और इंसाफ से होती थी। उस दौर में लोग कहा करते थे कि अगर किसी मुसलमान ने जुबान दे दी, तो वह पत्थर की लकीर होती थी। और बाजारों में मुसलमान ताजिरों (व्यापारियों) की ईमानदारी मिसाल मानी जाती थी।
पड़ोसी उनके अखलाक की तारीफ करते, गरीब कभी उनके दरवाजे से खाली हाथ नहीं लौटता था, और टोपी-दाढ़ी वालों को देखकर गैर-मुस्लिम भी अदब से रास्ता छोड़ दिया करते थे। लेकिन आज हालात बदल चुका है। अपनी ये हालत देखकर दिल दुखता है कि दुनिया आज इस्लाम को नहीं, बल्कि इस्लाम को मानने वाले हम और हमारे किरदार को देखकर हमारे बारे में फैसले ले रही है। आज मस्जिदों में इबादतो से ज्यादा झगड़े दिखाई देते है वहा इल्म देने से ज्यादा गुटबाजी की खबरों में आने लगे है और एक-दूसरे को छोटी-छोटी बातों पर नीचा दिखाने की होड़ लगी हुई है।
सियासत, लालच, झूठी शोहरत और अहंकार ने हुज़ूर के उम्मत को टुकड़ों में बांट दिया है, जिस उम्मत को रहमत बनना था, वह आज खुद परेशानियों में घिरी हुई है। जिस कौम को लोगों को इंसाफ और सच्चाई का पैगाम देना था आज उसी कौम पर से लोगों का भरोसा कमजोर होता जा रहा है।
लेकिन इस्लाम आज भी वही है, पाक, मुकम्मल और इंसाफ देने वाला है। अगर कुछ बदला है तो वह हमारा और आपका किरदार, अखलाक और सोच। जबकि कुरान आज भी वही है, नमाज वही है, अजान भी वही है, लेकिन अफसोस दिलों से उसकी मोहब्बत, सब्र, ईमानदारी और भाईचारा कम होता जा रहा है। गौरतलब हो कि जरूरत इस बात की है, कि हम दूसरों को बदलने से पहले खुद को बदलें।
मस्जिदों और मदरसों को सियासत और कमाई का अड्डा नहीं, बल्कि इल्म और इंसानियत का केंद्र बनाएं, नफरत नहीं, मोहब्बत फैलाएं, झूठ नहीं, सच्चाई अपनाएं। और इस्लाम को सिर्फ लिबास से नहीं, अपने किरदार से पेश करें।
क्योंकि याद रखिए गैर-मुस्लिम कौम कुरान पढ़कर नहीं, मुसलमानों को देखकर ज्यादा इस्लाम को समझती है। उम्मीद है कि ये पैग़ाम हमारे समाज के लिए बेहतरीन सबक साबित होगा।
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